इस देश की प्रमुख फसलों में से एक गेहूं है। भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 32 प्रतिशत भाग गेहूं का है। गेहूं के कुल उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत से अधिक भाग देश के पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के मैदानी भाग राजस्थान व मध्य प्रदेश से प्राप्त होता है इसका अनुमानित क्षेत्रफल 220.19 मिलियन हेक्टेयर है। गेहूं की प्रति हेक्टेयर हो गयी है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ ही गेहूं की पैदावार को बढ़ाने की भी आवश्यकता है। इस फसल को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले मुख्य रोग भूरा, पीला, काला रतुआ, छब्वा, चूर्णिल आसिता करनाल बंट, फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट इत्यादि है। गेहूं का रतुआ एक फफूंदी के द्वारा होने वाला रोग है। यह रोगजनक कवक जीन्स पक्सीनिया वर्ग में आता है। रतुआ भारत के विभिन्न भागों में रस्ट, किटट, रोली, त्रांव इत्यादि नामों से जाना जाता है।

गेहूँ (Wheat) की रोग ग्रस्त (Diseased) बालों को देखकर गेहूँ का अनावृत कण्ड (Loose Smut) खेतों में आसानी से पहचाना जा सकता है । सर्वप्रथम मेडाक्स ने इस रोग की प्रवृत्ति को बताया था परन्तु 1903 में ब्रेफेल्ड (Brefeild) ने उनके कार्य का पूर्ण अध्ययन किया ।

रोग के लक्षण:

गेहूँ के पौधों में रोग के लक्षण बाल (Ear) निकलने के बाद दिखाई देने लगते हैं अर्थात् रोग के लक्षण गेहूँ के पौधे के तने (Stem) तथा पत्तियों (Leaves) पर नहीं दिखायी देते हैं ।
सामान्य बालों के स्थान पर रोगी बालों के अण्डाशयों (Ovaries) में काले पाउडर (Black Powder) जैसे स्मटस्पोर्स (Smut Spores) मर जाते है । ये स्पोर्स (Spores) शिशु सूकियों (Young Spiker) के अन्दर बहुत पतली झिल्ली (Membrane) में बंद रहते हैं जैसे ही सूकियाँ (Spike Lets) पत्र छन्द (Leaf Sheath) से बाहर निकलती है ।

उनके आवरण फट जाते हैं और अण्डाशयों (Ovaries) के स्थान पर काले रंग के स्पोर्स (Spores) का पाउडर (Powder) दिखाई देने लगता है । स्मट स्पोर्स (Smut Spores) क्लेमाइडो स्पोर्स (Chlamydospores) कहलाते हैं जो बहुत आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर हवा (Wind) उड़ा लिए जाते हैं ।

गर्मी के दिनों में रोग ग्रस्त बालों (Diseased Ears) में क्लेमाइडो स्पोर्स (Chlamydospores) के उड़ जाने के कारण वृन्त (Stalk) समान रचना शेष रह जाती है ।

1. गेहूँ का लूजस्मट:
रोग कारक:

गेहूँ के लूज स्मट (Loose Smut of Wheat) का रोगजनक अस्टिलेगो नूडा वे॰ ट्रिटिसाई (Ustilago Nuda Var. Tritici) होता है जिसके क्लेमाइडोस्पोर्स बहुत छोटे होते हैं जिनका व्यास 4-8µ होता है । इनका रंग गहरा भूरापीला (Brown Yellow) होता है और इनकी बाहरी भित्ति मोटी तथा कँटीली (Spiny) होती है, जो ऐक्सोस्पोर (Exospore) कहलाती है ।

भीतरी भित्ति चिकनी तथा पतली होती है, जो एण्डोस्पोर (Exospore) कहलाती है । प्रत्येक क्लेमाइडोस्पोर (Chlamydospore) में दो केन्द्रकें (Nuclei) होती हैं, जिनमें से एक केन्द्रक (Nucleus) धन (+) स्ट्रेन (Strain) तथा दूसरा केन्द्रक ऋण (_) स्ट्रेन (Strain) वाला होता है ।

रोगी बालों से ये क्लेमाइडोस्पोर्स (Chlamydospores) हवा (Wind) द्वारा स्वस्थ बालों (Healthy Ears) पर ले जाये जाते हैं, जहाँ क्लेमाइडोस्पोर्स (Chlamydospores) पुष्पों की वर्तिकाग्रों (Stigmas) पर गिरकर अंकुरण करके प्रोमाईसीलियम (Promycelium) बनाते हैं ।
प्रोमाईसीलियम (Promycelium) नलिकाकर (Tubular) होती है जिसमें क्लेमाइडोस्पोर (Chlamydospores) का द्विगुणित (Diploid) केन्द्रक (Nucleus) आता है । यहाँ पर केन्द्रक (Nuclei) अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा चार अगुणित केन्द्रक (Haploid Nuclei) बनते हैं ।

इसके पश्चात् प्रोमाईसीलियम (Promycelium) में अनुप्रस्थ पट्ट (Transverse Septa) बनते हैं । जिसके फलस्वरूप चार बेसीडिया (Basidia) बन जाते हैं । चार बेसीडिया (Basidia) में से दो बेसीडिया धन (+) स्ट्रेन (Strain) तथा दो बेसीडिया ऋण (-) स्ट्रेन (Strain) के होते हैं ।

प्रत्येक बेसीडियम से एक संक्रमण कवकतन्तु (Infection Thread) निकलता है । इस प्रकार दो विभिन्न स्ट्रेन्स (Strains) के बेसीडिया (Basidia) से निकले हुए विभिन्न स्ट्रेन्स (Strains) के कवक तन्तु (Hyphae) आपस में मिलकर एक डाइकैरियोटिक कोशिका (Dikaryotic Cell) बनाते हैं जिससे डाइकैरियोटिक कवकतन्तु (Dikaryotic Hypha) बन जाता है, जो पुष्प (Flower) के वर्तिकाग्र (Stigma) से होता हुआ भ्रूण में पहुंच जाता है ।
भ्रूण (Embryo) में पहुंचकर यह कवकतन्तु मोटा (Thick), शाखित (Branched) तथा अनियमित आकर का हो जाता है और भ्रूण (Embryo) के प्रसुप्तावस्था (Dormant Stage) में पड़ा रहता है ।  वास्तव में लूज स्मट आफ ह्वीट (Loose Smut of Wheat) इण्टरनली सीड बोर्न (Internally Seed Borne) रोग कहलाता है, क्योंकि गेहूँ के बीज (Seed) बाहर से देखने पर स्वस्थ दिखायी देते हैं ।

जब ये संक्रमित बीज खेतों में बोये जाते हैं, तो ये अंकुरण करके नये पौधों को जन्म देते हैं । साथ ही साथ बीजों के भ्रूण (Embryo) में प्रसुप्तावस्था (Dormant Stage) में पड़ा हुआ कवकतन्तु (Hypha) सक्रिय (Active) होकर अंकुरण करने लगता है और बीजांकुरों (Seedling) के साथ-साथ वृद्धि करने लगता है । कवक-जाल गेहूँ के पौधों के तने में वृद्धि करता हुआ पुष्पों के अण्डाशयों (Ovaries) में पहुंच जाता है ।

अण्डाशयों में पहुँचकर डाईकैरियोटिक (Dikaryotic) कवकतन्तु (Hypha) की कोशिकाएँ गोल एवं मोटी भित्ति (Thick Wall) वाली हो जाती हैं, जो क्लेमाइडोस्पोर्स (Chlamydospores) को जन्म देती हैं और इस प्रकार पुष्पों के अण्डाशय (Ovaries), क्लेमाइडोस्पोर्स (Chlamydospores) से भर जाते है और वे फट जाते हैं । रोगी बालों से क्लेमाइडोस्पोर्स पुन: स्वस्थ पौधों के पुष्यों पर वायु (Wind) द्वारा पहुंच जाते हैं और इस प्रकार रोग चक्र चलता रहता है ।

रोग नियंत्रण (Treatment Methods):

अस्टिलेगो नुडा वे॰ ट्रिटिसाई (Ustilago Nuda var. Tritici) से उत्पन्न लूज स्मट ऑफ ह्वीट (Loose Smut of Wheat) को निम्न विधियों द्वारा नियन्त्रित किया जाता है:

(i) रोगग्रस्त गेहूँ के पौधों को खेती से जड़ सहित उखाड़कर दूर ले जाकर जला देना चाहिए ।

(ii) रोग रहित एवं स्वस्थ बीजों का चयन करना चाहिए ।

प्रायः निम्नलिखित दो उपचार प्रयोग में लाये जाते हैं:

(a) गर्म जल उपचार (Hot Water Treatment):

सर्वप्रथम जॉनसन ने इस रोग नियन्त्रण के लिए गर्म जल उपचार को अपनाया । उन्होंने बताया कि गेहूँ के बीजों में उपस्थित प्रसुप्तावस्था (Dormant Stage) में पड़ा कवक तन्तु (Hypha), उपयुक्त तापमान पर अंकुरित कराके अधिक तापमान के पानी द्वारा उपचारित करके नष्ट किया जा सकता है ।

इस विधि में गेहूँ के बीजों को बोने से पूर्व बड़े-बड़े बर्तनों से 26-30°C पर लगभग सात-आठ घण्टे तक भिगो दिया जाता है । ऐसा करने से गेहूँ के बीजों के भ्रूणों (Embryos) में प्रसुप्तावस्था (Dormant Stage) में उपस्थित कवकतन्तु (Hypha) सक्रिय होकर अंकुरण करके बीजों की बाहरी सतह पर निकल आते हैं ।

इसके पश्चात् इन बीजों को 40-45°C तापमान के पानी में लगभग 10 मिनट तक भिगो दिया जाता है । ऐसा करने में लगभग गेहूँ के बीजों से बाहर अंकुरित कवकतन्तु (Hyphae) नष्ट हो जाते हैं । इसके पश्चात् गेहूँ के बीजों को पानी से निकाल कर धूप में सुखा लिया जाता है और बोने के काम में लाया जाता है ।

(b) सूर्य ऊर्जा उपचार (Solar Energy Treatment):

पंजाब विश्वविद्यालय के पादप रोग विज्ञान विभाग के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ॰ लूथरा तथा बेदी ने इस विधि द्वारा गेहूँ के लूज स्मट ऑफ ह्वीट (Loose Smut of Wheat) नामक रोग (Disease) का नियन्त्रण किया ।

इस विधि में गेहूँ के बीजों को बड़े-बड़े बर्तनों में पानी भरकर 7-8 घण्टे तक सामान्य तापक्रम पर रख दिया जाता है, जिससे भ्रूण (Embryo) में प्रसुप्तावस्था (Dormant Stage) में पड़ा कवकतन्तु (Hypha) सक्रिय होकर बीजों की सतह पर आ जाता है ।

इसके पश्चात् पानी को निथार कर बीजों को मई, जून के महीनों में कड़ी धूप में खुले स्थान पर फैला दिया जाता है । ऐसा करने से कड़ी धूप के अधिक तापक्रम द्वारा अंकुरण कवक तन्तु नष्ट हो जाते हैं तथा बीज रोग रहित हो जाते हैं । इस प्रकार बीजों को सुखाकर बोने के काम में लाया जाता है ।

2. गेहूँ का ब्लेक रस्ट रोग:

पक्सीनिया ग्रेमिनिस (Puccinia Graminis) द्वारा गेहूँ में ब्लैक रस्ट (Black Rust of Wheat) नामक रोग होता है । इस कवक (Fungus) के जीवन-चक्र (Life-Cycle) में विभिन्न पाँच प्रकार के स्पोर्स (Spores) पाये जाते हैं । यह कवक अपना जीवन परजीवी (Parasite) के रूप में दो विभिन्न पोषकों (Hosts) अर्थात् गेहूँ (Wheat) एवं बारबेरी (Barberry) के ऊपर व्यतीत करता है ।

टिल्यूटोस्पोर (Teleutospores) में दो कोशिकाएँ (Cells) पायी जाती हैं और प्रत्येक कोशिका (Cell) में दो केन्द्रकें (Nuclei) होती हैं जिनमें से एक केन्द्रक प्लस (+) स्ट्रेन (Strain) तथा दूसरा केन्द्रक माइनस (-) स्ट्रेन (Strain) का होता है । ये दोनों केन्द्रकें (Nuclei) आपस में संयुजन (Fuse) करके एक डिप्लोइड केन्द्रक (Diploid Nucleus) बनाती हैं ।

इसके पश्चात् टिल्युटोस्पोर (Teleutospore) की प्रत्येक कोशिका (Cell) से एक प्रोमाइसीलियम (Promycelium) निकलती है जिसमें डिप्लोइड केन्द्रक (Diploid Nucleus), अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा 4 हैप्लोइड केन्द्रक (Haploid Nuclei) बनाता है जिसमें चार हेप्लोइड बेसीडियोस्पोर्स (Haploid Basidiospores) बनते हैं ।

इनमें से दो बेसीडियोस्पोर्स (Basidiospores) प्लस (+) स्ट्रेन (Strain) तथा दो बेसीडियोस्पोर्स (Basidiospores) माइनस (-) स्ट्रेन (Strain) के बनते हैं । प्रत्येक बेसीडियोस्पोर्स (Basidiospores) अंकुरण करके अपने ही स्ट्रेन (Strain) के कवकतन्तु (Hypha) बनाते हैं, जो बारबेरी (Barberry) की पत्ती (Leaf) की ऊपरी सतह (Upper Surface) से प्रवेश करके फ्लास्क (Flask) के आकार के पिक्नीडिया (Pycnidia) का निर्माण करते हैं ।

इस प्रकार से दो प्रकार के पिक्नीडिया (Pycnidia) बनते हैं जो प्लस (+) अथवा माइनस (-) स्ट्रेन (Strain) के पिक्नीडियोस्पोर्स (Pycnidiospores) तथा फ्लक्स हाइफा (Flexuous Hypha) का निर्माण करते हैं ।

प्लस (+) स्ट्रेन (Strain) के पिक्नीडियम (Pycnidium) से निकले हुए पिक्नीडियोस्पोर्स (Phycnidiospores) माइनस (-) स्ट्रेन (Strain) के पिक्नीडियम (Pycnidium) से निकले फ्लक्स हाइफा (Flexuous Hypha) से संयुजन करके निषेचन क्रिया (Fertilization) करते हैं जिसके फलस्वरूप पत्ती के मध्य में डाइकैरियोटिक माइसीलियम (Dikaryotic Mycelium) बन जाती है जो प्रोटोऐसीडियम (Protoaecidium) कहलाती है ।

मोटोऐसीडियम (Protoaecidium) से ऐसीडियल कप (Aecidial Cup) की पेरीडियम (Peridium) तथा ऐसीडियोफोर्स (Aecidiophores) बनते हैं ।

ऐसीडियोफोर्स (Aecidiophores) से अनेक बाइन्यूक्लिएट (Binucleare), ऐसीडियोस्पोर्स (Aecidiospores) उत्पन्न होते हैं जो ऐसीडियल कप (Aecidial Cup) में आकर पत्ती (Leaf) की निचली सतह (Lower Surface) के फट जाने पर बाहर निकल आते हैं ।

ये ऐसीडियोस्पोर्स (Aecidiospores) बाइन्यूक्लिएट (Binucleate) होते हैं जो हवा (Air) द्वारा गेहूँ (Wheat) के पौधों पर ले जाये जाते हैं । ऐसीडियोस्पोर्स (Aecidiospores), गेहूँ की पत्तियों (Leaves) पर यूरीडोसोराई (Uredosori) उत्पन्न करते हैं ।

इसके पश्चात्‌ गेहूँ के तनों पर टिल्यूटोसोराई (Teleutosori) बनते हैं । टिल्युटोसोराई (Teleutosori) अंकुरण करके पुन: बेसीडियोस्पोर्स (Basidiospores) बनाते हैं और इस प्रकार से पक्सीनिया (Puccinia) का जीवन-चक्र (Life-Cycle) चलता रहता है ।

पक्सीनिया ग्रेमिनिस (Puccinia Graminis) के जीवन-चक्र में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के स्पोर्स के विशिष्ट लक्षण:

(1) टिल्युटोस्पोर्स (Teleutospores):

(i) इनमें वृन्त (Stalk) लम्बा होता है जो अधिक मजबूत होता है ।

(ii) कवक (Fungus) के जीवन-चक्र (Life-Cycle) के ये स्पोर्स रेस्टिंग स्पोर्स (Resting Spores) कहलाते हैं, जो जीवन-चक्र की डिप्लोइड अवस्था (Diploid Phase) प्रदर्शित करते हैं ।

(iii) ये बाइसेल्ड (Bicelled) होते हैं जिनमें ऊपरी कोशिका निचली कोशिका की उपेक्षा बड़ी होती है ।

(iv) ऊपरी कोशिका का अग्रक (Apex) गोल होता है । दोनों कोशिकाएँ मोटी भित्ति (Thick Wall) वाली होती है ।

(v) टिल्यूटोस्पोर (Teleutospore) की प्रत्येक कोशिका में एक अंकुरण छिद्र (Germpore) होता है ।

(vi) स्पोर भित्ति (Spore Wall) मोटी (Thick), किन्तु चिकनी (Smooth) होती है ।

(2) बेसीडियोस्पोर्स (Basidiospores):

टिल्यूटोस्पोर्स (Teleutospores) के अंकुरण से कवकतन्तु (Hypha) बनता है, जिसमें चार कोशिकाएं (Cells) तथा चार स्टेरिगमेटा (Sterigmata) बनते हैं । इन स्टेरिगमेटा (Sterigmata) पर चार हेप्लोइड (Haploid), यूनीन्यूक्लिएट (Uninucleate), रंगहीन (Hyaline), बेसीडियोस्पोर्स (Basidiospores) उत्पन्न होता है । प्रत्येक बेसीडियोस्पोर अण्डाकार (Oval), पतली भित्ति (Thin Wall) वाला होता है जो अंकुरण करके एक अंकुरण नलिका (Germ Tube) बनाता है ।

(3) यूरोडोस्पोर्स (Uredospores):

(i) इनमें वृन्त (Stalk) लम्बा होता है ।

(ii) ये बाइन्यूक्लिएट (Binucleate) होते हैं ।

(iii) अण्डाकार (Oval) एवं पीले भूरे (Yellowish Brown) रंग के होते हैं ।

(iv) इनकी बाहरी भित्ति कँटीली (Echinulate) होती है और अंकुरण छिद्र (Germ Pores) समान दूरी पर स्थित होते हैं ।

(4) ऐसीडियोस्पोर्स (Aecidiospores):

(i) ये ऐसीडियल कप्स (Aecidial Cups) में ऐसीडियोफोर्स (Aecidiospores) से श्रृंखलाओं (Chains) में उत्पन्न होते हैं । दो ऐसीडियोफोर्स (Aecidiospores), इण्टरस्टीशियल (Interstitial) कोशिका (Cell) द्वारा पृथक हो जाते हैं ।

(ii) ऐसीडियल कप (Aecidial Cup) के बाहर एक आवरण होता है, जिसे पैरीडियम (Peridium) कहते हैं ।

(iii) प्रत्येक ऐसीडियोस्पोर, (Aecidiospore), बाइन्यूक्लिएट (Binucleate) तथा डाइकेरियोटिक (Dikaryotic) होता है ।

(iv) प्रत्येक ऐसीडियोस्पोर (Aecidiospore) की भित्ति (Wall) पर 6 अंकुरण छिद्र (Germ Pores) पाये जाते हैं ।

(v) ये अंकुरण करके अंकुरण नलिकाएँ (Germ Tubes) बनाते हैं ।

(5) पिक्नीडियोस्पोर्स (Pycnidiospores):

ये स्पोर्स पिकनीडियम (Pycnidium) के छिद्र से शहद की बूँद (Honey Drop) के साथ बाहर निकलते हैं जो बहुत छोटे आकार के यूनीन्यूक्लिएट (Uninucleate), गोल (Round) तथा मेल गेमीट्‌स (Male Gametes) कहलाते हैं ।

रोग का नियन्त्रण (Control of Disease Caused due to Wheat):
(1) रोग विकास के प्रारम्भिक अवस्था पर हाइ ऐडिमेफॉन के छिड़काव 7 से 20 दिन के अन्दर से करना चाहिए ।

(2) रोग प्रतिरोधी किस्मों को ही बोना चाहिए ।

(3) रोग लक्षण दिखाई देने पर रिल्ट (12.5 से 2.50 ग्राम/हैक्ट॰) के छिड़काव से 15 दिन के अन्तर से करना चाहिए ।

(4) बेनोडैनिल 20% का छिड़काव 8 से 10 दिन के अन्तर से करना चाहिए ।

(5) खेतों में रोग शुरू होने पर तुरन्त उपचार कर देना चाहिए ।

उकठा रोग के रोकथाम उपाय (Prevention of Wilt disease):
इसके नियंत्रण हेतु कासुगामायसिन 5% + कॉपर आक्सीक्लोराइड 45% [email protected] 300 ग्राम/एकड़ या कासुगामायसिन 3% [email protected] 400 मिली/ 200 लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

जैविक उपचार के रूप में स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस @ 250 ग्राम/200 लीटर पानी प्रति एकड़ छिड़काव के रूप में उपयोग करें।