मक्के की खेती कैसे होती है?
देश के किसान खरीफ सीजन में धान के बाद मक्का (Maize) की खेती करना प्रमुख मानते हैं. इसकी खेती, दाने, भुट्टे और हरे चारे के लिए होती है।  मक्का एक प्रमुख खाद्य फसल हैं, जो मोटे अनाजो की श्रेणी में आता है। यह एक मक्का या भुट्‌टा का ही स्वरूप है। भारत मे मक्का की खेती जिन राज्यो मे व्यापक रूप से की जाती है वे हैं- आन्ध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश इत्यादि। यह मनुष्य और पशुओ दोनों के लिए आहार का काम करती है | इसके अलावा व्यापारिक दृष्टि से भी इसका बहुत अधिक महत्त्व है | मक्के की फसल को मैदानी क्षेत्रों से लेकर 2700 मीटर ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है | भारत में मक्के की कई उन्नत किस्मे उगाई जाती है, जो कि जलवायु के हिसाब से शायद ही अन्य देशो में संभव हो | मक्का कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और विटामिन का अच्छा स्त्रोत है, जो कि मानव शरीर को ऊर्जा से भर देता है |




 

मक्का की वैरायटी

  • संकर जातियां - गंगा-1,
  • गंगा-4,
  • गंगा-11,
  • डेक्कन-107,
  • केएच-510,
  • डीएचएम-103,
  • डीएचएम-109,
  • हिम-129,
  • पूसा अर्ली हा-1 व 2,
  • विवेक हा-4,
  • डीएचएम-15 आदि।


कम्पोजिट जातियां - नर्मदा मोती, जवाहर मक्का-216, चन्दन मक्का-1, 2 व 3, चन्दन सफेद मक्का-2, पूसा कम्पोजिट-1, 2 व 3, माही कंचन, अरून, किरन, जवाहर मक्का- 8, 12 व 216, प्रभात, नवजोत आदि।

बीज की मात्रा:
संकर जातियां : 12 से 15 किलो/हे.
कम्पोजिट जातियां : 15 से 20 किलो/हे.
हरे चारे के लिए : 40 से 45 किलो/हे.
(छोटे या बड़े दानो के अनुसार भी बीज की मात्रा कम या अधिक होती है।)

मक्का बुवाई का समय :
1. खरीफ: जून से जुलाई तक।
2. रबी: अक्टूबर से नवम्बर तक।
3. जायद: फरवरी से मार्च तक।

मक्के के खेत को कैसे तैयार करे?
मक्के के बीजो को खेत में लगाने से पूर्व खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए | इसके लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर देनी चाहिए| इसके बाद कुछ समय के लिए खेत को ऐसे ही खुला छोड़ दे | मक्के की अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी को पर्याप्त मात्रा में उवर्रक देना आवश्यक होता है | इसके लिए 6 से 8 टन पुरानी गोबर की खाद को खेत में डाल देना चाहिए, फिर खेत की तिरछी जुताई करवा दे, जिससे खाद अच्छी तरह से मिट्टी में मिल जाये |

भूमि में जस्ते की कमी होने पर बारिश के मौसम से पहले 25 किलो जिंक सल्फेट की मात्रा को खेत में डाल देना चाहिए | खाद और उवर्रक को चुनी गई उन्नत किस्मो के आधार पर देना चाहिए | इसके बाद बीजो की रोपाई के समय नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा को देना चाहिए, और इसके दूसरे भाग को बीज रोपाई के एक माह बाद दे, और अंतिम भाग को पौधों में फूलो के लगने के दौरान देना चाहिए |

बीज उपचार :
फफूंदीनाशक बीज उपचार- बुवाई पूर्व बीज को थायरम या कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें, इन्हें पानी में मिलाकर गीला पेस्ट बनाकर बीज पर लगाएं।
कीटनाशक बीज उपचार- बीज और नए पौधों को रस चूसक एवं मिट्टी में रहने वाले कीटों से बचाने के लिए कीटनाशक से बीज उपचार जरूरी है| बीज को थायोमेथोक्जाम या इमिडाक्लोप्रिड 1 से 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें।
जैविक टीके से बीज उपचार- फफूंदीनाशक तथा कीटनाशक से उपचार के बाद बीज को एजोटोबेक्टर 5 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करके तुरंत बुवाई करें।

मक्के के पौधों की सिंचाई
मक्के की फसल को पूर्ण रूप से तैयार होने तक 400-600 मिमी पानी की जरूरी होती है | इसकी पहली सिंचाई को बीजो की रोपाई के तुरंत बाद कर देनी चाहिए | इसके बाद जब पौधों में दाने भरने लगे तब इसे सिंचाई की आवश्यकता होती है | मक्के की फसल की सिंचाई बीजो के रोपाई के समय के अनुसार की जाती है | इसके अतिरिक्त मक्के की फसल को खरपतवार से भी बचाना पड़ता है | खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई – गुड़ाई विधि का इस्तेमाल किया जाता है | मक्के के खेत में जब खरपतवार दिखाई दे तो प्राकृतिक तरीके से निराई-गुड़ाई कर खरपतवार नियंत्रण कर लेना चाहिए, तथा 20 से 25 दिन के अंतराल में खरपतवार दिखने पर उसे निकल देना चाहिए |

मक्के के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम
तना मक्खी रोग:  इस तरह के रोग का प्रकोप फसल में बसंत के मौसम में देखने को मिलता है | तना मक्खी रोग पौधों पर हमला कर उनके तनो को खोखला कर देता है, जिससे पौधा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है | इस रोग की रोकथाम के लिए फिप्रोनिल की 2 से 3 मिलीलीटर की मात्रा को प्रति लीटर पानी के हिसाब से डाल कर छिड़काव करे |
तना भेदक सुंडी रोग : इस तरह का रोग तने में छेद कर उसे अंदर से खाकर उसे सूखा देता है | जिससे तना सूख कर नष्ट हो जाता है | क्वीनालफॉस 30 या क्लोरेन्ट्रानीलीप्रोल का उचित मात्रा में छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है |
भूरा धारीदार मृदुरोमिल आसिता रोग: इस किस्म का रोग पौधों को अधिक हानि पहुँचता है | इस रोग के लग जाने से पौधों की पत्तियो पर हल्की हरी या पीली चौड़ी धारिया दिखाई देने लगती है | रोग के अधिक बढ़ जाने पर यह धारिया लाल रंग की हो जाती है, तथा सुबह के समय पत्तियो पर राख के रूप में फफूंद नज़र आती है | मेटालेक्सिल या मेंकोजेब की उचित मात्रा का छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है |
पत्ती झुलसा कीट रोग: यह कीट रोग पत्तियों के निचले हिस्से से शुरू होकर ऊपर की और आक्रमण करता है | इस रोग से प्रभावित होने पर पत्तियों की निचली सतह पर लम्बे, भूरे, अण्डाकार धब्बे नजर आते है | मेन्कोजेब या प्रोबिनब की उचित मात्रा का घोल बना कर पौधों पर छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है |

हानिकारक रोग और उनकी रोकथाम:
तने का गलना : इसे रोकने के लिए पानी खड़ा ना होने दें और जल निकास की तरफ ध्यान दें। रोग दिखाई देने पर 15 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन अथवा 60 ग्राम एग्रीमाइसीन तथा 500 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से अधिक लाभ होता है। अथवा 150 ग्रा. केप्टान को 100 ली. पानी मे घोलकर जड़ों पर डालना चाहिये।
पत्ता झुलस रोग : इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 या ज़िनेब 2.0-2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर 7-10 दिन के फासले पर 2-4 स्प्रे करने से इस बीमारी को शुरूआती समय में ही रोका जा सकता है।

सर्वोत्तम अभ्यास मक्का उत्पादन पर सुझाव

  • मक्का में बुवाई के 12 से 15 दिन बाद एक बार कुलपा चलाकर खरपतवारों की रोकथाम करना चाहिए| 
  • बुवाई के 25 से 30 दिन बाद एक बार खुरपी से निराई-गुड़ाई करनी चाहिए| 
  • अगर निराई-गुड़ाई नहीं कर पाएं हैं, तो खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव कर सकते हैं| 
  • मक्का में चौड़ी और सकरी पत्ती के खरपतवारों की रोकथाम के लिए टोपरामेजोन 6 प्रतिशत एससी (टिनज़र) 30 मिली प्रति एकड़+एडजुवेंट 200 मिली प्रति एकड़ 150 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 15 से 20 दिन बाद छिड़क दें| 
  • इसके अलावा चौड़ी पत्ती, घास और मौथा कुल के खरपतवारों की रोकथाम के लिए टेम्बोट्रायआन 42 प्रतिशत एससी (4% w/w) (लाउडिस) 115 मिली मात्रा प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 15 से 20 दिन बाद छिड़क दें. इससे मक्का की फसल में एकीकृत खरपतवार प्रबंधन अच्छी तरह हो सकता है| 

 

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